काश..मेरा भी घर होता


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

मेरे घर में निर्माण कार्य चल रहा था।मजदूरो में से एक था काशीराम..मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव से परिवार समेत दिल्ली मजदूरी करने आया था,फिर यहीं बस गया।एक-दो दिन में ही मेरी उससे अच्छी बातचीत हो गई।उसकी पत्नि साथ में ही मजदूरी करती थी।एक दिन मैंने उससे पूछा घर कहाँ है तुम्हारा?”उसके चेहरे के भाव ही बदल गए।उसने गंभीर होकर कहा हनुमान मंन्दिर वाली सङक के सिग्नल के पास।फिर वो अपने काम में लग गई।अगले दिन जोरदार बारिश हुई।उस दिन काम बन्द रहा।शाम को मौसम खुला तो मैं निकल पङी सैर पर।हनुमान मन्दिर वाली सङक पर पहुँची तो देखा काशीराम सङक के किनारे,बेहद परेशान खङा हुआ था।पास ही उसकी पत्नि अपनी झोपङीं (जो अब तक लगभग नष्ट हो चुकी थी),से सामान निकालकर एक जगह इकट्ठा कर रही थी।मैंने उस समय वहां से निकल जाना ही ठीक समझा।अगले दिन घर का काम फिर शुरू हो गया।काशीराम बहुत उदास लग रहा था।दोपहर में जब लंच टाइम हुआ और वो सुस्ताने लगे तो मैं हिम्मत जुटाकर अफसोस जताने उनके पास पहुँच गई।मैंने पिछले दिन की बात छेङी ही थी कि काशीराम रूआँसा होके बोला , “का करे बिटिया हम बेघर लोगो की तो यही जिन्दगी हैं।फिर उसकी पत्नि ने कहा, आप का समझोगी बिटिया रानी... घर के न होने से किन-किन मुसीबतों का सामना करना पङता है।मौसम की मर तो झेलो ही साथ में पुलिस के भगा देने का डर।काश.....हमारा भी अपना एक घर होता।इतना कहकर उसकी आँखों से झरझर आँसू बहने लगे।उस पल अहसास हुआ कि सिर पर एक छत का न होना कितना तकलीफदेह होता हैं।काशीराम ने तो कुछ ही दिनों मे अपनी झोपङी बना ली पर ये डर हर पल उसके मन में रहता कि न जाने कब वो बेघर लोग फिर दोबारा बेघर हो जाए।

सरकार और सैंकङों एनजीओ इस मूलभूत आवश्यकता (मकान) से वंचित लोगो को राहत दिलाने के काम में लगी है पर फिर भी कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आ रहे।काशीराम के परिवार के जैसे न जाने कितने लोग बिना छत के अपना पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं।आवश्यकता है कि सरकार इस ओर अपना ध्यान आकर्षित करे ताकि फिर कोई बारिश किसी काशीराम को बेघर न कर सके।

14 टिप्पणियाँ:

Bahut hi achcha laga yeh kahani roopi lekh.......... sochne ko majboor kar diya is ne.........

gud...... bahut achcha likha hai......

v touchy......

 

Shabnam .........plz yeh word verification hata do.........

isse na kaafi dikkat hoti hai.... isko hata dene se traffic bhi badh jayega......

bubye

TC

Regards...

 

बहुत अच्छी और पावन सोच...हम सब का येही सपना है...काश ये सच हो...
नीरज

 

बहुत अच्छा लिखती हैं आप, मनोभावनाएँ हृदयस्पर्शी हैं

---
चाँद, बादल और शाम

 

समाज के हर वर्ग को मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति होनी ही चाहिये। इस दिशा में सोच अच्छी है। वैसे हर दिशा में ही आपकी सोच अच्छी है। देर से प्रतिक्रिया के लिये क्षमा कीजियेगा। कारण आप जानती है।

 

वाकई ये एक कडवी हकीकत है। दिन बदिन बढ़ती मंहगाई ने लोगों के चूल्हे बुझा दिए हैं। महलों में रहने वाले नेता झोंपड़ों की तारीकी में जी रही आम जन्ता से बेख़बर हैं। गरीब बेचारा पूरी उम्र एक घर बनाने के लिए पसीने बहाता रहता है मगर आखिर में परेशान होकर यही कहता है कि...
मैं इस दुनिया को अकसर देख कर हैरान रहता हूं
ना मुझ से बन सका छोटा सा इक घर रोज़ कहता हूं
खुदाया तूने कैसे ये जहां सारा बना ड़ाला....

काश सबका अपना घर हो, जहां खुशियों का बसेरा हो, गम और आंसुओं का कहीं दूर दूर तक पता ना हो।
एक अच्छी पोस्ट के लिए शुक्रिया...

 

Main aapke zazbaat ki kadra karta hoon, lekin sirf likhne se kaam nhin chalega aise logon ke bare me kisi nazdeeki NGO ko batana hoga. shayad wo kuchhmadad kar saken..
Jai Hind...

 

apke sujhav ka me tahe dil se swagat karti hu Dipak Ji...

 

एक अच्छी पोस्ट के लिए शुक्रिया.............

 

ये संवेदनाएं ही हमें इंसान बनाती हैं।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

 

आपने इन चीज़ों पर सोचा यह अच्‍छा लगा... क्‍योंकि समाज को बदलने के लिए जरूरी है नौजवानों की संवेदनाएं बची रहें, वरना तो यह सिस्‍टम जानवर बनाने में कोई कसर बाकी नहीं छोड़ता है...

 

बढ़िया प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई.
ढेर सारी शुभकामनायें.

संजय कुमार
हरियाणा
http://sanjaybhaskar.blogspot.com

 

एक टिप्पणी भेजें