हाँ...मैं अलग हूँ।

लोगों के बीच रहकर भी,
अकेली ख़ुद को पाती हूँ,
वो कर देते हैं ख़ुद से जुदा मुझे,
ये कहकर कि मैं अलग हूँ...
जब कुछ बातें चलती हैं परम्पराओ की,
वो...जिन्हें हम सिर्फ़ ढो रहे हैं,
मैं कहती हूँ दफना दो उन्हें,
वो आंखे दिखाकर कहते है कि मैं अलग हू...
उनकी श्रद्घा के आगे
क्या सोना चांदी क्या हीरा है,
मैं देश की ग़रीबी का हवाला देती हूँ
वो चुप करा के कहते हैं कि मैं अलग हूँ...
जब अपने जैसे लोगों के साथ भी,
मैं अजीब सा बर्ताव पाती हूँ,
तब खुदको मैं तसल्ली देती हूँ,
मुस्कुराकर कहती हूँ "हाँ मैं अलग हूँ"।

(पिछली कविता लिखने पर आपने प्रेरित किया दोस्तों इसलिए एक नई कविता आपको समर्पित करती हूँ।)

3 टिप्पणियाँ:

जहाँ तक मैं आपको जानता और समझता हूँ निश्चित ही यह ज़रूर आपके अन्दरूनी दर्द से उपजी एक खू़बसूरत कृति है। आपका दर्द जायज़ है शबनम। इसी तरह दर्द और ज़िन्दगी के ख़ास लम्हों को शब्दों में बयाँ करतो रहिये। शुभकामनायें भविष्य के लिये।

 

bahut khoob..
aap sachmuch "alag" hain...

 

बहुत बढिया. लिखते रहिये. स्वागत है

 

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