दो कंधे...

दो नाज़ुक मासूम कंधे
बोझ उठाये फिरते है...
किसी की उम्मीदें
किसी के सपने
पूरा करते वो कंधे...

वो झुकते है
वो थकते है...
ज़िम्मेदारियों के बोझ तले दबे कंधे...

बनते है किसी का सहारा
किसी का दिलासा वो कंधे...

सूरज से तपते कभी
बारिश से भीगते कंधे
दर्द सहते
टूटते जुङते...

दो नाज़ुक मासूम कंधे....


17 टिप्पणियाँ:

बहुत सुंदर कविता, धन्यवाद

 

दो मासूम कंधे ... झुक जाते हैं टूटते नही .. किसी के लिए ...
बहुत खूब लिखा है ...

 

jiwan ki sacchayio ko chhuti hui rachna..bahut dino baad lekin bahut acchhi likhi badhayi...kaha busy ho aajkal?

 

bahut dino baad aapki ghazal dekhne ko mili hai shabnam ji ...bahut hi khoobsurat aur really touching likha hai .... aajkal aap hamare blog par tashreef nahi laati kya hum blogger se koi khata ho gayi ...aapka har roz aana aur aapke comments aage likhe ko inspire karega....shukriya
aleem azmi

 

ha bdiya hai
akhir sara bojh utha bhi
rhai hai yai kandhai

 

बहुत सुंदर कविता, धन्यवाद

 

really touchy...must read for youth also

 

Shabnam,
Chaliye kisi ko to sudh aayee masoom kandhon ki!
Rachna padhne ke baad khyal aaya ek din yehi kandhe kandha dene ke kaam aate hain!
Samvedansheel rachna!

 

आप बेहतर लिख रहे/रहीं हैं .आपकी हर पोस्ट यह निशानदेही करती है कि आप एक जागरूक और प्रतिबद्ध रचनाकार हैं जिसे रोज़ रोज़ क्षरित होती इंसानियत उद्वेलित कर देती है.वरना ब्लॉग-जगत में आज हर कहीं फ़ासीवाद परवरिश पाता दिखाई देता है.
हम साथी दिनों से ऐसे अग्रीग्रटर की तलाश में थे.जहां सिर्फ हमख्याल और हमज़बाँ लोग शामिल हों.तो आज यह मंच बन गया.इसका पता है http://hamzabaan.feedcluster.com/

 

aapke blog par acchhaa lagaa.. ek baar aayaa hoon, baar-baar aanaa chaahoongaa...

 

अच्छी कविता।खूब मन से लिखती हैँ। बधाई!

 

shabnam...tumhe pehli baar padha...bahut hi khoobsurat likhti ho tum...

 

अच्छी कविता।खूब मन से लिखती हैँ। बधाई!

 

बहुत सुंदर कविता...

 

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