अलग अलग

मज़हबों में छिपने लगी है इंसानियत

अब तुम अलग अब हम अलग

इस मुल्क में फैली एक अजीब सी दहशत

हर खून अलग हर सांस अलग....


क्या खूब लगती है वो बात

एक ही ईश्वर की है सब औलाद

फिर क्यूँ जब असलियत दिखती है

मेरा खुदा अलग तेरा भगवान अलग....


रास्ते तो एक ही बने थे पहले

पर मंज़िलें बंटती रही

कोई मंदिर कोई मस्जिद कोई गुरुद्वारा चला

हुई आत्मा अलग हुए परमात्मा अलग...


जीते तो है एक ही ज़मीन पर दोनों

क्यूँ जब मर जाते है तब

कोई जलता है कोई दफ्ऩ होता है

जाने कहाँ जाते है दोनों अलग अलग....???


23 टिप्पणियाँ:

क्या खूब लगती है वो बात

एक ही ईश्वर की है सब औलाद

फिर क्यूँ जब असलियत दिखती है

मेरा खुदा अलग तेरा भगवान अलग....

बहुत खूब लिखा है। वाकई में।

 

बेहतरीन संदेशा..उम्दा रचना!!

 

शबनम जी, एक अचछी रचना. शुभकामनायें.

 

रास्ते तो एक ही बने थे पहले

पर मंज़िलें बंटती रही

कोई मंदिर कोई मस्जिद कोई गुरुद्वारा चला

हुई आत्मा अलग हुए परमात्मा अलग...


अरे शबनम बहुत ही सुंदर लिखा!! काश इसे सब समझ सकते तो आज दुनिया मै ही स्वर्ग होता...

 

रास्ते तो एक ही बने थे पहले

पर मंज़िलें बंटती रही

कोई मंदिर कोई मस्जिद कोई गुरुद्वारा चला

हुई आत्मा अलग हुए परमात्मा अलग...

बहुत गम्भीर विषय लिया है आपने
सफ़ल प्रयास....बधाई

 

मज़हबों में छिपने लगी है इंसानियत
अब तुम अलग अब हम अलग
हम कब समझेंगे की हमारा एक ही मज़हब है - इंसानियत
सुन्दर रचना

 

shabnam jee
ham uvwaon ko isai algaw ko to dur karna hay
nahi to agli pidhi bhi yahi kahegi..

अब तुम अलग अब हम अलग
हर खून अलग हर सांस अलग...
मेरा खुदा अलग तेरा भगवान अलग...
हुई आत्मा अलग हुए परमात्मा अलग..

rachna sundar lagi..

 

जीते तो है एक ही ज़मीन पर दोनों
क्यूँ जब मर जाते है तब
कोई जलता है कोई दफ्ऩ होता है
जाने कहाँ जाते है दोनों अलग अलग..

बस इतना ही समझ नही आता ... हर खून का रंग भी तो लाल है ... साँस भी तो सब एक सी लेते हैं ... क्या धरती, आकाश, हवा, पानी, धूप, अग्नि ... किसी एक की होती है ...... जब कुद्रत ने फ़र्क नही किया तो फिर ये इंसानी फ़र्क क्यों ....

 

शबनम जी, एक अचछी रचना. शुभकामनायें.

 

दिल को छू रही है यह कविता .......... सत्य की बेहद करीब है ..........

 

bahut dino baad aapki rachna dekhne ko mili shabnam ji ....bahut khoobsurat andaaz me aapne sabhi mazhab ko darshaya hai ...waqt nikalkar hamare blogs par aaye shabnam ji

 

"अच्छा लिखा आपने और होली की ढेर सारी शुभकामनाएँ......."

प्रणव सक्सैना
amitraghat.blogspot.com

 

रास्ते तो एक ही बने थे पहले

पर मंज़िलें बंटती रही

कोई मंदिर कोई मस्जिद कोई गुरुद्वारा चला

हुई आत्मा अलग हुए परमात्मा अलग...

bahut khoobsurat lagi ye panktiya...sacchayi baya karti he puri gazel. badhayi.

 

बेहतरीन सन्देश

 

काश समाज के ठेकेदार आपके इस संदेश से कुछ सबक ले सकें... बेहतरीन है.. ब्लॉग का ले-आउट तो और भी बढ़िया हो गया है...

 

Superb shabnam, itni aachi tarah se aapne apna yeh message diya hai ke tarif ke liye shabad kam hai, God bless u, That almighty, jiska koi dharam nahi hai

 

शबनम जी,

वाक़ई दिल जीत लिया आपने..

बस आपकी एक पन्क्ति से मै असहमत हूं,

"एक ही ईश्वर की है सब औलाद"

जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं वो बेहूदा हमें क्या जनेगा!!

पढ़ता रहूंगा...!!

 

bahut achi rachna he

badhai aap ko

 

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