ख़ामोशी


शेर अर्ज़ है...

ख़ामोश रहना हमारा
अन्दाज़-ए-बयां है
इसी तरह हम अपनी
हर बात कह जाते है...

नज़्म पेश है...

ये ख़ामोशी
कुछ कहती है
चुपके से धीमे से
हर लफ़्ज़ चुरा लेती है
होठ सी देती है
ये ख़ामोशी
कुछ कहती है....

ये ख़ामोशी
क्यूँ रहती है
किसी के कुछ कहने पर
ये मुझे घेर लेती है
वक़्त फेर देती है
ये ख़ामोशी
क्यूँ रहती है...

अन्जाम-ए-मौहोब्बत


होठो की मुस्कुराहट
दिल में न उतर पायी
तुझे खुद से दूर कर दिया
पर खुद दूर न हो पाई....

ये कैसा इम्तेहा है
ये कैसी मजबूरियाँ
सब कुछ कह दिया
पर कुछ भी न कह पायी

अंधेरो में तलाशा तुझे
उजाले मैं कर न पायी
आँखों की नमी को
सबसे छुपाती चली आयी

अन्जाम-ए-मौहोब्बत क्या था
सिर्फ दर्द और तनहाई
हर लम्हा इस दिल को
तेरी ही याद आयी.....

आईना और मेरा अक़्स

अधखुली सी आँखें

खुद को ढूँढती है आईने में

फिर अक़्स देखकर अपना

कुछ खुल सी जाती है

सूरत देखकर अपनी

आईने से कहती है आँखें

तू कर रहा ग़ुस्ताखी है

ये मैं नहीं....

मेरी पहचान ये नहीं है

ऐ आईने मुझे दिखा

मेरा अक़्स खुद का

आईना मुस्कुराया...

कहने लगा

देखो ग़ौर करके

ये तुम ही तो हो

बस फर्क इतना है

कि तुम बदल गई हो

कल तुम सच थी

आज तुम दिखावा हो

कल कुछ सपने थे आँखों में

जो आज भुला दिए है तुमने

ज़िन्दगी की दौङ में

खुद को खो आई कहीं

तेरी पहचान तेरी सूरत नहीं

उम्मीदों से भरी चमकदार आँखे थी

जिनसे तू मुझमें

अपना अक़्स देखा करती थी

जा जाके नए ख़्वाब सजा

उम्मीदें लगा कुछ नई

तब खुदकी सूरत में तू

हमेशा खुद को ही पाएगी...