हम तुम मिलकर आओ
एक ऐसा एहसास जगाए
रिश्तों की परिभाषा से दूर
बेनाम एक रिश्ता जी जाए....
जिसमें “मै” भी साँसे ले
और “तुम” भी जगह पाए
मिसाल भले न बने हम
पर सुकून ज़िन्दगी में आए....
न तुम मुझ पर हक़ जताओ
न हम तुमसे कुछ चाहे
हम कोई सौदागर तो नहीं
जो लेन देन पर टिक जाए....
आओ एक ऐसी छाया तलाशे
छाँव में जिसकी दो पल बिताए
अतीत की परछाई न हो जहाँ
कोहरे भविष्य के न घेर पाएँ....
रिश्तों के पुराने साँचे को
हम तुम मिलकर गलाएँ
तपिश कुछ ऐसी दे फिर से
नया आकार वो पा जाएँ....
हम तुम मिलकर आओ
एक ऐसा एहसास जगाए
रिश्तों की परिभाषा से दूर
बेनाम एक रिश्ता जी जाए....
