एक ‘काश...’ के
बाद
होती है अलग ही दुनिया
वो दुनिया
जिसकी हमे ख्वाहिश है,
जिसकी शक़्ल
इस तरफ की दुनिया से
कुछ अलग है,
कुछ ज़्यादा खूबसूरत
किसी नूर से सजी हुई,
लेकिन,
मुझे लगता है अक़्सर
वो दुनिया,
जो अक़्स है ख्वाबों का मेरे
क्यों ‘काश...’ ने
बेईमानी कर
अलग कर दी है मुझसे,
वो ‘काश...’ के
बाद की
ख़्वाबों वाली दुनिया।

