अधूरी ज़िन्दगी

हर खुशी से महरुम है

ये ज़िन्दगी अब मेरी

कि तेरे बिन अधूरी है

ज़िन्दगी अब मेरी

न सुबह की ता़ज़ग़ी न रात की ठंडक

रूठी हुई है मुझसे ज़िन्दग़ी अब मेरी

है राहों में अब अंधेरा ही अंधेरा

ढूंढती है बस तुझे ही निगाहे अब मेरी

हौसले बढ़ाने को तो सब है मेरे पास

बस नहीं है तो खुद की उम्मीदें अब मेरी

बहुत हक़ से प्यार किया है

पर तुझे कदर कहाँ है मेरी

तू तो मुझे जानता भी नहीं है

फिर कैसे कहूँ तुझे तू ज़िन्दग़ी है मेरी

हर खुशी से महरुम है

ये ज़िन्दगी़ अब मेरी

कि तेरे बिन अधूरी है

ये ज़िन्दग़ी अब मेरी

मेरे लफ़्ज़

लफ़्ज़ों को रौशनाई का साथ दे दूँ गर

कोई काग़ज़ ऐसा मिल जाए

शब के अंधेरों में भी जिसमें

सब कुछ नज़र आए

तब वो भी पढ़ पाएंगे मेरे इन जज़्बातों को

गर उनके पास मेरे लिए

पल दो पल का वक़्त निकल आए...

कश-म-कश


कश-म-कश है मन में

चल रही है हर पल

खुद से पूछती हूँ सवाल कुछ

जानना चाहती हूँ खुद को

कौन हूँ मैं क्या मक़सद है मेरा

ज़िन्दगी को कहा ले जा रही हूँ

अपनी उम्मीदें पूरी कर रही हूँ या

अपनों को दिलासा दे रही हूँ

ठहर सी गई है ज़िन्दगी मेरी

कुछ फैसलों की ज़रुरत है अब

क्या करुँ कौन सी राह चुनु

जवाब ये ढूँढ रही हूँ

कश-म-कश है मन में

चल रही है हर पल