


अधखुली सी आँखें
खुद को ढूँढती है आईने में
फिर अक़्स देखकर अपना
कुछ खुल सी जाती है
सूरत देखकर अपनी
आईने से कहती है आँखें
तू कर रहा ग़ुस्ताखी है
ये मैं नहीं....
मेरी पहचान ये नहीं है
ऐ आईने मुझे दिखा
मेरा अक़्स खुद का
आईना मुस्कुराया...
कहने लगा
देखो ग़ौर करके
ये तुम ही तो हो
बस फर्क इतना है
कि तुम बदल गई हो
कल तुम सच थी
आज तुम दिखावा हो
कल कुछ सपने थे आँखों में
जो आज भुला दिए है तुमने
ज़िन्दगी की दौङ में
खुद को खो आई कहीं
तेरी पहचान तेरी सूरत नहीं
उम्मीदों से भरी चमकदार आँखे थी
जिनसे तू मुझमें
अपना अक़्स देखा करती थी
जा जाके नए ख़्वाब सजा
उम्मीदें लगा कुछ नई
तब खुदकी सूरत में तू
हमेशा खुद को ही पाएगी...

वो ऐसी आग जिसमें धुआँ नहीं..
एक ऐसा हादसा जो कभी हुआ नहीं..
एक ऐसी नदी जिसका किनारा नही..
एक ऐसा भँवरा जो आवारा नही..
वो ऐसी नींद जिसमें ख्वाब नहीं..
एक ऐसा दिन जिसकी रात नही.
एक ऐसी मौहब्बत जिसमें अहसास नहीं
एक ऐसा रेगिस्तान जिसे प्यास नहीं
वो सिर्फ एक भ्रम है कोई हक़ीकत नहीं
क्या वो है या है ही नहीं?