अन्जाम-ए-मौहोब्बत


होठो की मुस्कुराहट
दिल में न उतर पायी
तुझे खुद से दूर कर दिया
पर खुद दूर न हो पाई....

ये कैसा इम्तेहा है
ये कैसी मजबूरियाँ
सब कुछ कह दिया
पर कुछ भी न कह पायी

अंधेरो में तलाशा तुझे
उजाले मैं कर न पायी
आँखों की नमी को
सबसे छुपाती चली आयी

अन्जाम-ए-मौहोब्बत क्या था
सिर्फ दर्द और तनहाई
हर लम्हा इस दिल को
तेरी ही याद आयी.....

आईना और मेरा अक़्स

अधखुली सी आँखें

खुद को ढूँढती है आईने में

फिर अक़्स देखकर अपना

कुछ खुल सी जाती है

सूरत देखकर अपनी

आईने से कहती है आँखें

तू कर रहा ग़ुस्ताखी है

ये मैं नहीं....

मेरी पहचान ये नहीं है

ऐ आईने मुझे दिखा

मेरा अक़्स खुद का

आईना मुस्कुराया...

कहने लगा

देखो ग़ौर करके

ये तुम ही तो हो

बस फर्क इतना है

कि तुम बदल गई हो

कल तुम सच थी

आज तुम दिखावा हो

कल कुछ सपने थे आँखों में

जो आज भुला दिए है तुमने

ज़िन्दगी की दौङ में

खुद को खो आई कहीं

तेरी पहचान तेरी सूरत नहीं

उम्मीदों से भरी चमकदार आँखे थी

जिनसे तू मुझमें

अपना अक़्स देखा करती थी

जा जाके नए ख़्वाब सजा

उम्मीदें लगा कुछ नई

तब खुदकी सूरत में तू

हमेशा खुद को ही पाएगी...

क्या वो है.....?

वो ऐसी आग जिसमें धुआँ नहीं..

एक ऐसा हादसा जो कभी हुआ नहीं..

एक ऐसी नदी जिसका किनारा नही..

एक ऐसा भँवरा जो आवारा नही..


वो ऐसी पहेली जिसका जवाब नहीं..

एक ऐसी कहानी जिसका अन्त नहीं..

एक ऐसी ग़ज़ल जिसमें जज़्बात नहीं..

एक ऐसी किताब जिसमें अक्षर नही..


वो ऐसी नींद जिसमें ख्वाब नहीं..

एक ऐसा दिन जिसकी रात नही.

एक ऐसी मौहब्बत जिसमें अहसास नहीं

एक ऐसा रेगिस्तान जिसे प्यास नहीं


वो सिर्फ एक भ्रम है कोई हक़ीकत नहीं

क्या वो है या है ही नहीं?