मैं खुशी हूँ...

मैं खुशी हूँ...

इस भागती दौङती ज़िन्दगी में
राहत की सांस हूँ
किसी से दूर किसी के पास
मैं खुशी हूँ...

इन्सान की चाहत हूँ मैं
एक खूबसूरत अहसास हूँ
महसूस करते हो कभी –कभी मुझे
मैं खुशी हूँ...

कभी दिल में घर करती हूँ
कभी चेहरे पर दिखती हूँ
हसरत है मेरी सबको
मैं खुशी हूँ...

हर दुआ में मुझे माँगते हो
साथ ज़िन्दगी भर चाहते हो
पर पाकर मुझे भूल जाते हैं
मैं खुशी हूँ...

आशियाना कोई नहीं है मेरा
कभी यहाँ तो कभी वहाँ रहती हूँ
आँखे बंद करो और महसूस करो
मैं खुशी हूँ...।

माँ..मुझे मार दो



प्यारी माँ,
तुम्हे देखा तो नहीं है, न ही तुम्हारी आवाज़ सुनी है, पर तुम्हारी धङकनों से सब समझती हूँ। माँ...आज तुमसे कुछ कहना चाहती हूँ। मैं बहुत डरी हुई हूँ। माँ कल ही जब तुम्हारी धङकनो की रफ्तार बङी तो मुझे पता चला कि पङोस वाली गीता दीदी के साथ क्या हुआ। दीदी के चेहरे पर किसी ने तेजाब डाल दिया है न माँ...वो जल गई है न...मैंने महसूस किया था दीदी की माँ रो-रो कर कह रही थी “मेरी बेटी का क्या कसूर था...सिर्फ छेङखानी का विरोध ही तो किया था न उसने...उसकी इतनी बङी सजा़? क्या होगा अब मेरी बेटी का...???”...माँ, दीदी का क्या दोष था..?
माँ परसो मुझे चोट लग गई...जानती हूँ आपको भी काफी चोटे लगी है...पापा ने आपको क्यूँ मारा माँ? मुझे बहुत दर्द होता है...ऐसी चोटे मुझे अक्स़र लगती रहती है..माँ पापा से कहिये न कि उनकी हिंसा उनकी बेटी तक पहुँच रही है..मां..करुणा बुआ की आहट अब कब सुनाई देगी? हा माँ..आपकी धङकनों ने सब बता दिया।करुणा बुआ का स्कूल छुङवा कर उनकी शादी करवा दी न माँ..पर अभी तो वो छोटी है न माँ..अब वो खेलने कैसे जाएंगी माँ..?मैंने तो सोचा था उन्हीं से पढ़ना लिखना सीखूंगी।दादू ने बुआ की शादी इतनी जल्दी क्यूँ कर दी माँ..?
माँ उस दिन चाचा के गुस्से को आपकी धङकन से महसूस किया था।चाची अपने घर से क्या नहीं लायी जो चाचा उनको लाने को कह रहे थे माँ...चाचा चाची को वापस भेजने को भी तो कह रहे थे न..पर माँ,चाची तो अभी अभी ही आई है..मैं तो सोच रही थी चाची ही मुझे तैयार किया करेंगी।चाचा से कहो न माँ...कितना सामान तो लाई थी चाची..अब वो उन्हें घर न भेजे...
माँ आपको मेरी नन्ही आँखों को खुलते देखने का..मेरे छोटे गुलाबी हाथों को अपने हाथों में लेने का.. रोने की आवाज़ सुनने का बहुत इंतज़ार है न..मैं जानती हूँ आपको जानकर बहुत दुख होगा,पर माँ..मैं बहुत डर गई हूँ।माँ सारी बेटियों की ज़िन्दगी ऐसी क्यूँ होती है?आपकी दुनिया में आने के बाद मेरी हालत भी गीता दीदी,करूणा बुआ,चाची और आपकी तरह हो जाएगी न?माँ मुझपर रहम करो,मैं इस बेरहम दुनिया में नहीं जी पाऊंगी..इसलिए मेरी ये विनती सुन लो...माँ मुझे जन्म न दो...मार डालो...इससे पहले की मैं बारबार मरुँ...
आपकी अजन्मी बेटी

काश..मेरा भी घर होता


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

मेरे घर में निर्माण कार्य चल रहा था।मजदूरो में से एक था काशीराम..मध्य प्रदेश के एक छोटे से गांव से परिवार समेत दिल्ली मजदूरी करने आया था,फिर यहीं बस गया।एक-दो दिन में ही मेरी उससे अच्छी बातचीत हो गई।उसकी पत्नि साथ में ही मजदूरी करती थी।एक दिन मैंने उससे पूछा “घर कहाँ है तुम्हारा?”उसके चेहरे के भाव ही बदल गए।उसने गंभीर होकर कहा “हनुमान मंन्दिर वाली सङक के सिग्नल के पास”।फिर वो अपने काम में लग गई।अगले दिन जोरदार बारिश हुई।उस दिन काम बन्द रहा।शाम को मौसम खुला तो मैं निकल पङी सैर पर।हनुमान मन्दिर वाली सङक पर पहुँची तो देखा काशीराम सङक के किनारे,बेहद परेशान खङा हुआ था।पास ही उसकी पत्नि अपनी झोपङीं (जो अब तक लगभग नष्ट हो चुकी थी),से सामान निकालकर एक जगह इकट्ठा कर रही थी।मैंने उस समय वहां से निकल जाना ही ठीक समझा।अगले दिन घर का काम फिर शुरू हो गया।काशीराम बहुत उदास लग रहा था।दोपहर में जब लंच टाइम हुआ और वो सुस्ताने लगे तो मैं हिम्मत जुटाकर अफसोस जताने उनके पास पहुँच गई।मैंने पिछले दिन की बात छेङी ही थी कि काशीराम रूआँसा होके बोला , “का करे बिटिया हम बेघर लोगो की तो यही जिन्दगी हैं।”फिर उसकी पत्नि ने कहा, “आप का समझोगी बिटिया रानी... घर के न होने से किन-किन मुसीबतों का सामना करना पङता है।मौसम की मर तो झेलो ही साथ में पुलिस के भगा देने का डर।काश.....हमारा भी अपना एक घर होता।”इतना कहकर उसकी आँखों से झरझर आँसू बहने लगे।उस पल अहसास हुआ कि सिर पर एक छत का न होना कितना तकलीफदेह होता हैं।काशीराम ने तो कुछ ही दिनों मे अपनी झोपङी बना ली पर ये डर हर पल उसके मन में रहता कि न जाने कब वो बेघर लोग फिर दोबारा बेघर हो जाए।

सरकार और सैंकङों एनजीओ इस मूलभूत आवश्यकता (मकान) से वंचित लोगो को राहत दिलाने के काम में लगी है पर फिर भी कोई ठोस परिणाम सामने नहीं आ रहे।काशीराम के परिवार के जैसे न जाने कितने लोग बिना छत के अपना पूरा जीवन व्यतीत कर देते हैं।आवश्यकता है कि सरकार इस ओर अपना ध्यान आकर्षित करे ताकि फिर कोई बारिश किसी काशीराम को बेघर न कर सके।